सीमा का सम्बन्ध एक अजीब से जाल में उलझा था — घर की परंपराओं और अपनी खुद की चाहतों के बीच। सास को लगता था कि हर बहू का एक खास रोल होता है: शांत रहना, हँसना, परिवार की मर्यादा बनाए रखना। पर सीमा की आत्मा बीच-बीच में उभरने वाली छोटी-छोटी चाहतों की आग से जलती रहती थी — किताबें पढ़ना, शाम को छत पर ताज़ी हवा में खो जाना, कभी-कभी फिल्म हॉल जाना। यह बातें उसने धीरे-धीरे अपने भीतर दबा रखी थीं, क्योंकि घर में खुलकर बोलने का 'ठीक' समय शायद कभी नहीं आता।